पेश से इंजीनियर जेसन फ्रुयन हाल ही में अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे। नई नौकरी हासिल करने के लिए उन्होंने बहुत ही अनूठा तरीका अपनाया। वह हर रोज सुबह पांच बजे उठकर व्यस्त रहने वाले मेनचेस्टर मार्ग पर पहुंच जाते थे। उस वक्त उनके गले में एक बोर्ड लटका होता था, जिस पर उनका एक संक्षिप्त बायोडाटा और टेलीफोन नंबर रहता था। शुरुआत में तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया।
लोगों को लगता था कि वह वास्तव में भिखारी हैं और लोगों को इस तरह ठगने की कोशिश कर रहे हैं। खैर, धीरे-धीरे उनकी चर्चा ऑफिसों में होने लगी। इसके बावजूद पांच माह तक भाग्य उनसे रूठा रहा, लेकिन जेसन ने अपनी इस दिनचर्या को बदस्तूर जारी रखा। वह शहर के प्रमुख मार्ग पर सुबह पांच बजे पहुंच जाते और बोर्ड को गले में लटकाए हुए घूमते। अंतत: 157वें दिन, जब वे सेंट्रल बिजनेस का चक्कर लगा रहे थे, उन्हें एक कॉल मिली और उनसे एक ऑफिस में मिलने को कहा गया।
यह वह जगह थी जहां प्रमुख कंपनियों के मुख्यालय स्थित थे। ऑफिस पहुंचने पर शुरुआती बातचीत में उन्हें पता चला कि वहां के लोग उनकी नियमित दिनचर्या देखते आ रहे थे। यही नहीं, उन्हें यह भी बताया गया कि उन्हें उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि से ज्यादा इसलिए तवज्जो दी गई, क्योंकि वह नियम से अपना प्रयास करते रहे। जीन हालांकि खुश थे कि अंतत: उन्हें नौकरी मिल गई थी। इसके बाद उन्होंने जिस समर्पण और लगन के साथ नौकरी तलाश की थी, उसी समर्पण और लगन के वह अपने काम को अंजाम देने लगे।
जेसन को इस तरह नौकरी मिलने की बात जैसे-जैसे फैलती गई, अन्य लोगों ने भी अपने गले, पीठ, माथे और शरीर के अन्य खुले भागों पर स्वयं का इश्तिहार चिपकाकर घूमना शुरू कर दिया। वे चाहते थे कि इस तरह उन पर भी लोगों का ध्यान जाए। रोचक बात यह थी कि किसी भी अखबार या चैनल ने नौकरी ढूंढने के इस असामान्य किंतु रोचक ढंग को तवज्जो नहीं दी। जेसन को भी लगता कि अगर उसके तरीके को मीडिया में स्थान दिया जाता तो शायद वह 157 दिन से पहले ही नौकरी हासिल कर लेता।
फंडा यह है कि जिस तरह लक्ष्य को हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, वैसे ही सही मार्केटिंग और विज्ञापन भी जरूरी है।
लोगों को लगता था कि वह वास्तव में भिखारी हैं और लोगों को इस तरह ठगने की कोशिश कर रहे हैं। खैर, धीरे-धीरे उनकी चर्चा ऑफिसों में होने लगी। इसके बावजूद पांच माह तक भाग्य उनसे रूठा रहा, लेकिन जेसन ने अपनी इस दिनचर्या को बदस्तूर जारी रखा। वह शहर के प्रमुख मार्ग पर सुबह पांच बजे पहुंच जाते और बोर्ड को गले में लटकाए हुए घूमते। अंतत: 157वें दिन, जब वे सेंट्रल बिजनेस का चक्कर लगा रहे थे, उन्हें एक कॉल मिली और उनसे एक ऑफिस में मिलने को कहा गया।
यह वह जगह थी जहां प्रमुख कंपनियों के मुख्यालय स्थित थे। ऑफिस पहुंचने पर शुरुआती बातचीत में उन्हें पता चला कि वहां के लोग उनकी नियमित दिनचर्या देखते आ रहे थे। यही नहीं, उन्हें यह भी बताया गया कि उन्हें उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि से ज्यादा इसलिए तवज्जो दी गई, क्योंकि वह नियम से अपना प्रयास करते रहे। जीन हालांकि खुश थे कि अंतत: उन्हें नौकरी मिल गई थी। इसके बाद उन्होंने जिस समर्पण और लगन के साथ नौकरी तलाश की थी, उसी समर्पण और लगन के वह अपने काम को अंजाम देने लगे।
जेसन को इस तरह नौकरी मिलने की बात जैसे-जैसे फैलती गई, अन्य लोगों ने भी अपने गले, पीठ, माथे और शरीर के अन्य खुले भागों पर स्वयं का इश्तिहार चिपकाकर घूमना शुरू कर दिया। वे चाहते थे कि इस तरह उन पर भी लोगों का ध्यान जाए। रोचक बात यह थी कि किसी भी अखबार या चैनल ने नौकरी ढूंढने के इस असामान्य किंतु रोचक ढंग को तवज्जो नहीं दी। जेसन को भी लगता कि अगर उसके तरीके को मीडिया में स्थान दिया जाता तो शायद वह 157 दिन से पहले ही नौकरी हासिल कर लेता।
फंडा यह है कि जिस तरह लक्ष्य को हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, वैसे ही सही मार्केटिंग और विज्ञापन भी जरूरी है।